बिलासपुर जिले की बेटी बस्तर के आदिवासी बच्चों के मन में जगा रही कला,संस्कृति की अलख

बि​लासपुर। जिले की बेटी दीप्ति ओग्रे में नाट्य कला व छत्तीसगढ़ी संस्कृति को आगे बढ़ाने का ऐसा जुनून है कि वे आठ वर्षों से बस्तर के आदिवासी बच्चों के मन में कला व संस्कृति की अलख जगा रही है। साथ ही अपनी उपलब्धियों और गतिविधियों से युवाओं को प्रेरित करते हुए भारतीय संस्कृति में विविधता में एकता की भावना भर रही हैं।

चकरभाठा की रहने वाली दीप्ति ओग्रे गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय में पत्रकारिता एवं जनसंचार की छात्रा रही हैं। यहां पढ़ाई पूरी करने के बाद वर्धा के पत्रकारिता विश्विवद्यालय में रंगमंच की शिक्षा ली। इसके बाद वे नाटक,लघु फिल्म करने लगी। साथ ही कला, संस्कृति से नई पीढ़ी को जोड़ने का काम शुरू की। दीप्ति ने इसके लिए बस्तर के आदिवासी क्षेत्र के बच्चों को चुना।

पिछले आठ साल से आदिवासी बच्चों को कला-संस्कृति के महत्व व उपयोगिता को समझा रही हैं। बच्चों को पेंटिंग के माध्यम से छत्तीसगढ़ी परंपराओं के बारे में बताती हैं। उन्होंने बताया कि वर्ष 2016 से रंगमंच में सक्रिय हैं। छत्तीसगढ़ के अलावा महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार, हिमाचल में अनेक स्थानों पर आयोजित राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय नाट्य समारोह में अभिनय कर चुकी हैं। वे द लास्ट एब जैसी लघु डाक्यूमेंट्री फिल्मों में अभिनय कर चुकी हैं।

सुरूज ट्रस्ट की स्थापना

दीप्ति ओग्रे ने छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध लोक गायन भरथरी के संरक्षण के लिए संस्था बनाई है। भरथरी लोक गायन को जन-जन तक पहुंचाने का काम कर रही हैं। उन्होंने लोकनृत्य, लोकनाट्य व संगीत छत्तीसगढ़ की विभिन्न नृत्य, नाट्य, संगीत संरक्षण व संवर्धन के लिए सुरूज ट्रस्ट के माध्यम से कार्यक्रमों का आयोजन करती हैं।

महाराष्ट्र के राज्यपाल कर चुके हैं सम्मानित

साल 2021 में बस्तर नाटय रंग संगठन का गठन कर गोदना, घड़वा, तुमा, लौह शिल्प में प्रदेश के कलाकारों के साथ अभिनय प्रस्तूत कर चुकी हैं। राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय सेमिनार व कार्यक्रमों में अपने संगठन के माध्यम से प्रस्तुति देती हैं। बस्तर के आदिवासी समुदाय के बीच कुपोषित बच्चों और महिलाओं के स्वास्थ पर स्थानीय समाज सेवकों के साथ मिलकर बस्तर जिले में काम कर रही हैं। इनके कामों को देखते हुए महाराष्ट्र के राज्यपाल ने साल 2022 में स्वयं सिद्धा सम्मान से सम्मानित किया था।

छत्तीसगढ़ के गोदना को पेंटिंग के रूप में सहेज रही हैं

दीप्ति कला और सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय रूप से कार्यरत हैं। मुख्य रूप से लोककला और बस्तर के आदिवासी कला को अपने कार्य का केन्द्र बनाकर काम कर रही हैं। आदिवासी महिलाओं और बच्चों के बीच अपना वक्त देती है। उन्होंने छत्तीसगढ़

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