मालदीव के नए राष्‍ट्रपति मुइज्‍जू के साथ ही चीन ने जीत ली आधी जंग, बढ़ेगा अमेरिका और भारत का बीपी!

बीजिंग: चीन के समर्थक और ‘इंडिया आउट’ कैंपेन को आगे बढ़ाने मोहम्‍मद मुइज्‍जू अब मालदीव के नए राष्‍ट्रपति हैं। मुइज्‍जू ने अपने विजयी भाषण से साफ कर दिया है कि आने वाले में वह भारत के लिए सिरदर्द बनने वाले हैं। सोमवार को जब उन्‍होंने समर्थकों को संबोधित किया तो कहा कि वह देश से विदेशी सेनाओं को हटाकर रहेंगे। मुइज्‍जू ने इस बात पर जोर दिया है कि उनके देशवासियों की इच्‍छा के विरुद्ध मालदीव में कोई भी विदेशी सैनिक नहीं रहेगा। उनका कहना था कि कार्यभार संभालने के बाद वह विदेशी सैनिकों को हटाने की कोशिशें शुरू कर देंगे। मुइज्‍जू का आना चीन के लिए गुड न्‍यूज है। रक्षा विशेषज्ञ मान रहे हैं कि उनके सत्‍ता में आने के बाद से हिंद महासागर पर भारत की चुनौतियां दोगुनी होने वाली हैं।

चीनी मीडिया बोली, चीन की जीत

45 साल के मुइज्‍जू को राजधानी माले के मेयर भी रहे हैं राष्‍ट्रपति चुनावों में 54 फीसदी वोट हासिल करके आए हैं। गहरे नीले पानी वाला खूबसूरत देश मालदीव पर्यटकों के अलावा भारत और चीन के बीच प्रतिद्वंद्विता का मैदान भी रहा है। यह द्वीप राष्‍ट्र अपनी राजनीति से पूरे दक्षिण एशिया को हिला सकता है। भारत और चीन के अलावा अमेरिका भी इसका पारंपरिक साझेदार रहा है। साफ है कि आने वाले दिनों में हिंद महासागर क्षेत्र में बड़ी उथल-पुथल देखने को मिलने वाली है। चीनी सरकारी मीडिया ने मुइज्जू की जीत को चीन की जीत करार दिया है। साथ ही उसने मुइज्‍जू के सत्‍ता में आने को अमेरिका और भारत के लिए बड़ा झटका बताया है। बीजिंग डेली ने लिखा है, ‘भारत को बड़ा कूटनीतिक झटका लगा है।

अमेरिका और भारत पर बयान

अखबार के मुताबिक अमेरिका और भारत को चीन के ‘केवल दो रणनीतिक प्रतिस्पर्धी’ के तौर पर ही पहचाना गया है। मालदीव अभी तक चीनी पर्यटकों के लिए एक प्रमुख गंतव्य के तौर पर शामिल नहीं हुआ है और न ही व्‍यवसाय में इसकी कोई ज्‍यादा भागीदारी है। लेकिन यह मुइज्‍जू इसे बदल सकते हैं। अगले महीने वह राष्‍ट्रपति पद संभालेंगे लेकिन इससे पहले से ही उन्‍हें ‘चीन समर्थक’ कहा जाने लगा है। सिनामाले ब्रिज आज भी द्वीप देश में चीन के के बढ़ते कद का प्रतीक माना जाता है। यह ब्रिज बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के जरिए से चीनी फंडिंग के कारण पहले चीन-मालदीव मैत्री ब्रिज के रूप में जाना जाता था।

मालदीव पर चीनी कर्ज

भारत परंपरागत रूप से मालदीव को अपने हिंद महासागर प्रभाव क्षेत्र के हिस्से के रूप में देखता है। साथ ही मानवीय उद्देश्यों के लिए द्वीपसमूह पर भारतीय सैनिकों की एक छोटी टुकड़ी को तैनात रखता है। मालदीव में चीन की पहुंच कोई नई बात नहीं है। पांच साल पहले मालदीव के लोगों ने अपने पूर्व नेता मोहम्मद यामीन को वोट दिया था। उन्‍हें बड़े स्‍तर पर चीन से अस्थिर तरीके से कर्ज लेने के तौर पर देखा गया है। यामीन को चीन की कर्ज नीति का ‘पोस्टर चाइल्ड’ तक कहा गया था। साल 2019 में, राष्‍ट्रपति सोलिह के सलाहकार मोहम्मद नशीद ने कहा कि माले पर तीन अरब डॉलर तक का कर्ज हो सकता है। 4.9 अरब डॉलर की जीडीपी वाले मालदीव के लिए यह बहुत भारी कर्ज है।

अमेरिका और भारत का रुख

मालदीव के दक्षिण में, भारत ने हिंद महासागर में अपने समुद्री डाकुओं को रोकने की रणनीति के तहत एक नई पुलिस ट्रेनिंग एकेडमी और ड्रग रिहैब सेंटर का निर्माण किया है। फिर भी मालदीव में भारत की मौजूदगी को लेकर संदेह है। साथ ही चीन के साथ मजबूत संबंधों को संतुलित करने की इच्छा भी है। मालदीव, भारतीय सैनिकों को संप्रभुता के खतरे और उल्लंघन के तौर पर मानता है। विशेषज्ञों का कहना है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भी अब प्रतिस्पर्धा बढ़ जाएगी। भारत और चीन दोनों एक-दूसरे के खिलाफ प्रतिस्पर्धा करेंगे। उनका मकसद मालदीव को खुश करना होगा। अमेरिका ने मालदीव के साथ अपने संबंधों के भविष्य के बारे में हालांकि अभी तक किसी बेचैनी का संकेत नहीं दिया है।

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