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रेलवे जमीन की लीज खत्म हो चुकी और नई लीज नहीं तो वहां रहना अवैध, हाई कोर्ट का फैसला

Chhattisgarh February 25, 2026 रिपोर्टर: shailesh
रेलवे जमीन की लीज खत्म हो चुकी और नई लीज नहीं तो वहां रहना अवैध, हाई कोर्ट का फैसला

रेलवे जमीन की लीज खत्म हो चुकी और नई लीज नहीं तो वहां रहना अवैध, हाई कोर्ट का फैसला

बिलासपुर : हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने रेलवे भूमि से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट करते हुए कहा है कि बिना वैध और नवीनीकृत लीज के रेलवे जमीन पर कब्जा रखने का कोई अधिकार नहीं है. अदालत ने इस आधार पर दीपचंद कछवाहा द्वारा दायर रिट अपील को खारिज कर दिया. यह फैसला मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा एवं न्यायमूर्ति रविन्द्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ द्वारा सुनाया गया.

क्या है पूरा मामला?

अपीलकर्ता दीपचंद कछवाहा, जो बिलासपुर रेलवे स्टेशन क्षेत्र स्थित अनंता होटल परिसर में व्यवसाय कर रहे थे. उन्होंने दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के अधिकारियों द्वारा की जा रही बेदखली कार्रवाई को चुनौती दी थी. इससे पूर्व उनकी याचिका को 15 जनवरी 2026 को एकल पीठ द्वारा निस्तारित कर दिया गया था, जिसके विरुद्ध यह रिट अपील दायर की गई थी. अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता ने पक्ष रखा, वहीं रेलवे की ओर से उप सॉलिसिटर जनरल उपस्थित हुए. दोनों पक्षों ने अदालत को बताया कि इसी प्रकार का मामला पहले ही असलम हुसैन बनाम दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे में निस्तारित किया जा चुका है.

अदालत की प्रमुख टिप्पणियां

अपीलकर्ता के पक्ष में कोई वैध, पंजीकृत और प्रभावी लीज मौजूद नहीं है. केवल लीज किराया या टैक्स जमा करने से कानूनी अधिकार उत्पन्न नहीं होता. लीज समाप्त होने और नवीनीकरण न होने की स्थिति में संबंधित व्यक्ति अनधिकृत कब्जेदार माना जाएगा. रेलवे भूमि का स्वामित्व केंद्र सरकार के पास है और रेलवे पर अवैध कब्जे हटाने का वैधानिक दायित्व है. रेलवे के वाणिज्यिक विभाग में पुनर्वास या वैकल्पिक दुकान देने की कोई नीति अस्तित्व में नहीं है. रेलवे स्टेशन के विस्तार एवं परिचालन आवश्यकताओं के लिए भूमि की आवश्यकता होने पर रेलवे को लीज न बढ़ाने का अधिकार है. लंबे समय से कब्जे में रहना स्वामित्व या स्थायी अधिकार प्रदान नहीं करता.

पूर्व निर्णय पर भरोसा

अदालत ने माना कि वर्तमान मामला पूरी तरह से डब्ल्यू ए 131 ऑफ 2026 के समान है, जिसमें पहले ही स्पष्ट कर दिया गया था कि बिना वैध लीज के कब्जा रखने वालों को पुनर्वास का अधिकार नहीं है. इसलिए इस मामले में अलग दृष्टिकोण अपनाने का कोई कारण नहीं है. हाईकोर्ट ने कहा कि एकल पीठ के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि या गंभीर खामी नहीं है, अतः उसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है. रिट अपील खारिज करते हुए अदालत ने आदेश दिया कि यह मामला भी 11 फरवरी 2026 के पूर्व निर्णय की शर्तों के अनुसार निस्तारित माना जाएगा.

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