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छत्तीसगढ़ के इस गांव में नहीं होती पत्थरों की मूर्ति! महिलाओं के प्रवेश के नियम भी हैं अलग, जानिए अबूझमाड़ की अनोखी देवगुड़ी

Chhattisgarh September 17, 2026 रिपोर्टर: shailesh
छत्तीसगढ़ के इस गांव में नहीं होती पत्थरों की मूर्ति! महिलाओं के प्रवेश के नियम भी हैं अलग, जानिए अबूझमाड़ की अनोखी देवगुड़ी

छत्तीसगढ़ के इस गांव में नहीं होती पत्थरों की मूर्ति! महिलाओं के प्रवेश के नियम भी हैं अलग, जानिए अबूझमाड़ की अनोखी देवगुड़ी

बस्तर। छत्तीसगढ़ का अबूझमाड़ अपनी घनी हरियाली, दुर्गम पहाड़ियों और समृद्ध आदिवासी परंपराओं के लिए जाना जाता है। यहां की माड़िया और मुड़िया जनजातियों की जीवनशैली प्रकृति के बेहद करीब रही है। इसी संस्कृति की एक अनोखी झलक गांवों और जंगलों के बीच मौजूद देवगुड़ी में देखने को मिलती है।

सामान्य मंदिरों से अलग देवगुड़ी में न तो भव्य भवन होता है और न ही बड़ी पत्थर या सीमेंट की मूर्तियां। यहां प्रकृति, लकड़ी, पत्थर और पारंपरिक प्रतीकों के माध्यम से देवी-देवताओं की आराधना की जाती है।

भव्य मंदिर नहीं, प्रकृति के बीच आस्था

देवगुड़ी आमतौर पर गांव के बाहर या जंगल के समीप साधारण छप्पर के नीचे बना पारंपरिक आस्था स्थल होता है। आसपास महुआ, सरई और सल्फी जैसे पेड़ दिखाई देते हैं।

यहां देवी-देवताओं के प्रतीक के रूप में लकड़ी के खंभे, विशेष पत्थर, त्रिशूल, लोहे की सांकल तथा मिट्टी से बने घोड़े या हाथी जैसी आकृतियां रखी जा सकती हैं।

आंगा देव की विशेष मान्यता

देवगुड़ी की परंपरा में आंगा देव का विशेष महत्व माना जाता है। किसी विशेष अवसर या गांव में संकट की स्थिति में पवित्र लकड़ी का चयन कर देव स्वरूप तैयार करने की परंपरा कई क्षेत्रों में देखने को मिलती है।

बीजा या सरई की लकड़ियों को जोड़कर पालकी जैसी आकृति बनाई जाती है। पूजा-अनुष्ठान के बाद इसे देवता का स्वरूप माना जाता है। धार्मिक आयोजनों के दौरान ग्रामीण इसे कंधे पर उठाकर गांव में भ्रमण भी कराते हैं।

देवराही में पेड़ों की कटाई और शिकार पर रोक

देवगुड़ी के आसपास के जंगल को कई स्थानों पर देवराही कहा जाता है। स्थानीय परंपराओं में ऐसे क्षेत्रों को पवित्र मानते हुए पेड़ों की कटाई और शिकार जैसी गतिविधियों पर रोक रखने की व्यवस्था रही है।

इस तरह धार्मिक आस्था केवल पूजा तक सीमित नहीं रहती, बल्कि जंगल और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से भी जुड़ जाती है।

पहली उपज पहले देवता को अर्पित

कई आदिवासी गांवों में नई फसल और जंगल से मिलने वाली उपज को देवगुड़ी की परंपरा से जोड़ा जाता है। नई फसल, महुआ, आम या अन्य उपज का पहला हिस्सा देवता को अर्पित करने के बाद उसके उपयोग की परंपरा कुछ क्षेत्रों में देखने को मिलती है।

यह प्रकृति से प्राप्त संसाधनों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की भावना को दर्शाती है।

गायता और सिरहा की महत्वपूर्ण भूमिका

देवगुड़ी से जुड़े धार्मिक और सामुदायिक आयोजनों में गायता और सिरहा की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। गायता पारंपरिक रूप से गांव के धार्मिक प्रमुख के रूप में पूजा-अनुष्ठान से जुड़ा होता है।

वहीं सिरहा से संबंधित स्थानीय मान्यताओं में विशेष धार्मिक अवस्था में देवता के प्रभाव की बात कही जाती है। बीमारी, संकट या सामुदायिक समस्याओं के समय कुछ गांवों में पारंपरिक रूप से उससे मार्गदर्शन लेने की परंपरा रही है।

सिर्फ पूजा नहीं, सामाजिक चर्चा का केंद्र भी

कई गांवों में देवगुड़ी केवल धार्मिक स्थल नहीं होती, बल्कि सामुदायिक चर्चा का स्थान भी होती है। गांव से जुड़े सामाजिक विषयों, पारिवारिक विवादों या सामुदायिक मामलों पर पारंपरिक व्यवस्था के तहत चर्चा की जाती रही है।

हालांकि महिलाओं के प्रवेश सहित धार्मिक नियम हर गांव और क्षेत्र में एक जैसे नहीं होते। कहीं विशेष पूजा या अवसरों पर कुछ प्रतिबंध हो सकते हैं, तो कहीं नियम अलग हो सकते हैं। इसलिए इसे पूरे अबूझमाड़ या पूरे आदिवासी समाज पर लागू सामान्य नियम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

आधुनिकता के बीच परंपरा को बचाने की कोशिश

आधुनिकता और बदलती जीवनशैली के बीच पारंपरिक देवगुड़ियों के संरक्षण की आवश्यकता भी महसूस की जा रही है। संरक्षण से जुड़े प्रयासों में कई स्थानों पर बुनियादी सुविधाएं विकसित करने की कोशिश की गई है, ताकि इन पारंपरिक आस्था स्थलों का मूल स्वरूप सुरक्षित रखा जा सके।

अबूझमाड़ की देवगुड़ी इस बात की अनोखी मिसाल है कि यहां आस्था केवल मंदिर या मूर्ति तक सीमित नहीं, बल्कि जंगल, जमीन, पेड़-पौधों और सामुदायिक जीवन से गहराई से जुड़ी हुई है।

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