मृत्यु रहित जीवन , अज्ञता रहित विज्ञान , दु:ख रहित आनन्द की समुपलब्धि है मुक्ति : पुरी शंकराचार्य

जगन्नाथपुरी : हिन्दुओं के सार्वभौम धर्मगुरु एवं हिन्दू राष्ट्र प्रणेता पूज्यपाद पुरी शंकराचार्य स्वामी श्रीनिश्चलानंद सरस्वतीजी महाभाग आचार्य शंकर एवं श्रीनीलकण्ठ के मध्य शास्त्रार्थ में प्रत्युत्तर तर्कों की चर्चा करते हुये उद्घृत करते हैं आचार्य शंकर ने कहा कि सुख – दु:ख आदि मनोधर्म हैं , ना कि आत्मधर्म। अतएव सुख – दु:ख आदि मानसीय भेदक मनोधर्म आत्म भेदक सिद्ध नहीं हो सकते। चित् सामान्य की सर्वत्र व्याप्ति होने पर भी उसकी स्फुट अभिव्यक्ति पाषाण आदि तथा तृण आदि की अपेक्षा मनुष्य आदि जङ्गम शरीरों में ही सम्भव है। कर्मेन्द्रिय , ज्ञानेन्द्रिय , अन्तः करण और प्राण अभिव्यञ्जक स्थूल देह के विद्यमान  रहने पर भी कर्म विपाक के कारण जीव अभिव्यञ्जक कर्मेन्द्रिय , ज्ञानेन्द्रिय , अन्तःकरण और प्राण संज्ञक लिङ्ग देह विहीन स्थूल देह में चेतना का सञ्चार नहीं परिलक्षित होता। अतः आत्म चैतन्य से चेतित हित अहित बुद्धि सम्पन विकार युक्त अन्तः करणनिष्ठ कर्तृत्व मानना ही श्रुति तथा युक्ति सम्मत है।

विषय संस्पर्शज आनन्द की दुःख सम्भिन्नता सिद्ध होने पर भी ब्रह्मात्म तत्त्व की आनन्द रूपता ही सिद्ध है ; ना कि दुःख सम्भिन्नता। उद्भव और विलय शून्य ब्रह्म स्वरूप आनन्द रूपता की निरावरण स्फूर्ति ही श्रुति सम्मत अभय पद समुपलब्धि रूपा मुक्ति है ; केवल दुःख उच्छेद की मुक्ति रूपता असिद्ध है। अभिप्राय यह है कि अनित्य , अचित् तथा दुःख रूप दृश्य प्रपञ्च से अतीत तथा विलक्षण आत्मा के अनुरूप आत्म स्थिति की मुक्ति रूपता तभी सम्भव है , जब आत्म अनुरूप मुक्ति की सच्चिदानन्द रूपता सिद्ध हो। श्रीमद्भागवत आदि श्रुति स्मृतियों के अनुशीलन से यह तथ्य सिद्ध है कि आत्मा अबाध्य , अवेद्य , अभोग्य एवं अपरोक्ष सच्चिदानन्द स्वरूप है। उसकी पर प्रेमास्पदता के कारण परमानन्द रूपता भी अतिरोहित है। तत्त्वज्ञ की दृष्टि में आत्म स्वरूप में अध्यस्त जगत् की आत्म रूपता ही सिद्ध है ; अतः जगत् की आनन्द रूपता चरितार्थ है। अन्धकार का अभाव प्रकाश के सद्भाव के बिना असम्भव है। अतः दुःख हानि और सुख उपलब्धि मुक्ति है।

सच्चिदानन्द रूप स्वरूप वैभव के बल पर मृत्यु, अज्ञता तथा दुःख का आत्यन्तिक उच्छेद मोक्ष है। ध्यान रहे ; जीव की चाह के वास्तव विषय की समुपलब्धि मुक्ति है। मृत्यु रहित जीवन , अज्ञता रहित विज्ञान , दुःख रहित आनन्द की समुपलब्धि मुक्ति है अर्थात् अनात्म प्रपञ्च से अतीत तथा विलक्षण अखण्ड सच्चिदानन्द रूप से अवस्थिति मुक्ति है। अभिमत की समुपलब्धि से सुलभ प्रिय , उसके सेवन से सुलभ मोद तथा यथेष्ट संसेवन सुलभ प्रमोद रूप उत्तरोत्तर उत्कृष्ट विषय आनन्द की भी तिलाञ्जलि देकर सुषुप्ति में प्रीति तथा प्रवृत्ति का नियामक भोक्ता , भोग और भोग्य सुलभ द्वैत प्रभव श्रम से त्राण की भावना है। त्रिपुटी बीज सुषुप्ति में जीव आनन्द भुक्  होता है। जिस प्रकार प्रकाश की विद्यमानता के बिना अन्धकार का निवारण असम्भव है ; उसी प्रकार सुख उपलब्धि के बिना दुःख अभाव की सिद्धि असम्भव है। परम प्रेमास्पद आत्मा की स्वतः सिद्ध सुख रूपता की बहिः प्रज्ञा के योग से समुपलब्धि जाग्रत् है , अन्तः प्रज्ञा के योग से स्फूर्ति स्वप्न है और घनी भूता प्रज्ञा के योग से अभिव्यक्ति सुषुप्ति है। जीव की स्व प्रकाश सदानन्द रूप अवशेषता मुक्ति है।

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