‘सुख-दुख गाय के बछड़े के समान हैं’, जानें क्यों आचार्य चाणक्य ने कही ऐसी बात

विनाश काले विपरीत बुद्धि’ यह एक प्रसिद्ध संस्कृत श्लोक है, जिसका अर्थ है कि अगर कोई व्यक्ति अपनी बुद्धि का उपयोग सही तरीके से नहीं करता है तो उसके लिए बर्बाद होने का समय आने वाला है। चाणक्य नीति में भी आचार्य चाणक्य ने इस बारे में विस्तार से उल्लेख किया है। आचार्य चाणक्य ने कहा है कि एक व्यक्ति को अगर सही नीतियों का पालन नहीं करते हुए गलत फैसले लेने की आदत होती है, तो उसे अपने ही नुकसान का कारण बनना पड़ता है। आचार्य चाणक्य ने कहा है –

उपस्थितविनाशः पथ्यवाक्यं न शृणोति

इस श्लोक में आचार्य चाणक्य ने लिखा है कि जिसका विनाश निकट होता है, वह अपने हित की बात नहीं सुनता | जब मनुष्य के दुर्दिन आते हैं तो वह अपना भला चाहने वाले की बात की ओर भी ध्यान नहीं देता। कहा भी गया है कि मनुष्य के विनाश से पूर्व उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। ‘विनाशकाले विपरीत बुद्धिः।

नास्ति देहिनां सुखदुःखाभावः

आचार्य ने यहां लिखा है कि प्रत्येक देहधारी व्यक्ति के जीवन के साथ दुःख और सुख लगे रहते हैं, जिसने मनुष्य जीवन धारण किया है उसे सुख और दुःख किसी-न-किसी रूप में प्राप्त होते रहते हैं। जिस प्रकार जीवन में मनुष्य का बीमार रहना दुःख है और स्वस्थ रहना सुख, उसी प्रकार सफलता और असफलता भी मानव जीवन के दो पहलू हैं।

मातरमिव वत्साः सुखदुःखानि कर्तारमेवानुगच्छन्ति

आचार्य चाणक्य आगे कहते हैं कि जैसे बछड़ा माता के पास जा पहुंचता है, वैसे ही सुख और दुःख अपने कर्ता के पास जा पहुंचते हैं। सुख और दुःख मनुष्य के जीवन के आवश्यक अंग है परंतु उनकी उत्पत्ति का कारण वह स्वयं होता है। जिस प्रकार गाय का बछड़ा गाय की अपनी उत्पत्ति है और वह उसके पीछे-पीछे चलता है, उसी प्रकार मनुष्य द्वारा उत्पन्न किए गए सुख और दुःख उसका पीछा करते हैं।

तिलमात्रमप्युपकारं शैलमात्रं मन्यते साधुः

यहां आचार्य चाणक्य ने कहा है कि सज्जन पुरुष तिल के समान छोटे से उपकार को भी पहाड़ के समान बड़ा मानते हैं। यह सज्जन पुरुष का स्वभाव होता है कि कोई व्यक्ति जो उनका छोटा-सा उपकार करता है, वे उसे बड़ा भारी उपकार मानते हैं और उसके प्रति कृतज्ञ बने रहते हैं।

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