लोकल से ग्लोबल हो रहा बस्तर, दुनिया तक पहुंचेगा यहां के कलाकारों का हुनर, ई-कॉमर्स से खुलेंगे नए रास्ते

रायपुर : कभी नक्सल हिंसा की खबरों से पहचाना जाने वाला बस्तर, अब विकास और आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रहा है. वो बस्तर, जहां वर्षों तक बंदूक की गूंज सुनाई देती थी, अब वहां के कलाकारों की कला देश-दुनिया के बाजारों तक पहुंचने जा रही है. बस्तर नक्सल मुक्त होने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है और अब यहां की पहचान संघर्ष नहीं, बल्कि संस्कृति, शिल्प और संभावनाएं बन रही हैं.

ढोकरा शिल्प, काष्ठ कला समेत अन्य चीजों को मिलेगी पहचान

राज्य शासन ने बस्तर के पारंपरिक हस्तशिल्प को वैश्विक मंच देने के लिए 1 करोड़ 80 लाख रुपए की विशेष परियोजना को मंजूरी दी है. इस पहल के तहत पहली बार बस्तर के ढोकरा शिल्प, काष्ठ कला, टेराकोटा, सीसल शिल्प, पारंपरिक वेशभूषा और तुम्बा कला जैसे उत्पाद अमेजन, फ्लिपकार्ट और मीशो जैसे बड़े ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बिकेंगे.

घने जंगलों, झरनों और समृद्ध आदिवासी संस्कृति के बीच बसा बस्तर… यहां की मिट्टी में कला बसती है और हर शिल्प अपने भीतर सदियों पुरानी परंपरा की कहानी समेटे हुए है, लेकिन विडंबना यह रही कि बस्तर के कलाकारों की कला अक्सर गांवों, हाट-बाजारों और मेलों तक ही सीमित रह जाती थी. शिल्पकार महीनों मेहनत करते थे, लेकिन उनके उत्पादों को बड़ा बाजार नहीं मिल पाता था. अब तस्वीर बदलने वाली है.

ई-कॉमर्स से खुलेंगे नए रास्ते

राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन बिहान, संकुल स्तरीय संगठन और कलागुड़ी के माध्यम से संचालित होने वाली 1.80 करोड़ रुपए की विशेष परियोजना को मंजूरी मिल गई है. इस परियोजना का मकसद सिर्फ हस्तशिल्प बेचना नहीं, बल्कि बस्तर के कलाकारों को डिजिटल अर्थव्यवस्था से जोड़ना है. पहली बार बस्तर के हस्तशिल्प उत्पाद देश के सबसे बड़े ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म अमेजन, फ्लिपकार्ट और मीशो पर ऑनबोर्ड किए जाएंगे. अब दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु या विदेशों में बैठा ग्राहक भी बस्तर की ढोकरा कला और लकड़ी की नक्काशी को एक क्लिक पर खरीद सकेगा.

बस्तर को मिलेगी नई पहचान

यह पहल ऐसे समय में शुरू हो रही है. जब बस्तर विकास की नई राह पर तेजी से आगे बढ़ रहा है. एक समय था जब बस्तर का नाम सुनते ही लोगों के मन में नक्सलवाद की तस्वीर उभरती थी. आज वही बस्तर अपनी कला, संस्कृति और उद्यमिता के दम पर देश-दुनिया से जुड़ने की तैयारी कर रहा है. यह बदलाव केवल बाजार का नहीं, बल्कि सोच और पहचान का भी है. परियोजना के लिए स्वीकृत राशि अगले तीन वर्षों में चरणबद्ध तरीके से खर्च की जाएगी.

इसमें लगभग 80 प्रतिशत राशि रोटेशनल फंड के रूप में उपयोग होगी. यानी शिल्पियों द्वारा तैयार उत्पादों की सीधी खरीद कर इन्वेंट्री बनाई जाएगी. इस व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि कलाकारों को अपने उत्पाद बिकने का इंतजार नहीं करना पड़ेगा. उन्हें समय पर भुगतान मिलेगा और उनकी आय में स्थिरता आएगी. विशेषज्ञ इसे शिल्पकारों के लिए आर्थिक सुरक्षा कवच मान रहे हैं.

इस महत्वाकांक्षी योजना से बस्तर के करीब एक हजार शिल्पियों और लगभग ढाई सौ परिवारों को जोड़ा जाएगा. पहले चरण में 250 से 300 शिल्पकारों का चयन किया जाएगा. इन कलाकारों को 60 से 90 दिनों का विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा, जिसमें आधुनिक डिजाइन, उत्पाद गुणवत्ता, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और ऑनलाइन मार्केटिंग की बारीकियां सिखाई जाएंगी. यानी अब बस्तर का शिल्प सिर्फ पारंपरिक नहीं रहेगा, बल्कि आधुनिक बाजार की मांग के अनुरूप भी तैयार होगा.

बस्तर की ढोकरा कला में सिर्फ धातु नहीं ढलती… उसमें पीढ़ियों का अनुभव, परंपराओं की विरासत और आदिवासी जीवन की आत्मा बसती है. लकड़ी के एक-एक शिल्प में जंगलों की कहानी छिपी होती है. मिट्टी से बने टेराकोटा उत्पादों में बस्तर की संस्कृति सांस लेती है. अब यही कहानियां गांवों की चौपालों से निकलकर डिजिटल दुनिया के विशाल बाजार तक पहुंचेंगी. बस्तर बदल रहा है.

बंदूक की पहचान पीछे छूट रही है और कला, संस्कृति और रोजगार की नई तस्वीर सामने आ रही है. नक्सलवाद की छाया से बाहर निकलता बस्तर अब देश-दुनिया से सीधे जुड़ने जा रहा है, और शायद पहली बार… बस्तर के कलाकारों के हाथों से बनी कलाकृतियां सिर्फ किसी मेले की दुकान तक नहीं, बल्कि दुनिया के हर उस घर तक पहुंचेंगी जहां भारतीय कला की कद्र है.

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