रायपुर : देश भर में दशहरा का पर्व धूमधाम से मनाया जाता है. इस दिन को जीत का प्रतीक माना जाता है. जगह-जगह रावण दहन किया जाता है. पर छत्तीसगढ़ के कुछ जगहों पर उल्टा होता है. यहां दशहरे के दिन रावण का दहन नहीं होता, बल्कि राजा की सवारी निकाली जाती है. यह परंपरा सदियों से चली आ रही है जिसे देखने के लिए लोग एकत्रित होते हैं.
16वीं सदी से चल रही परंपरा
मिली जानकारी के मुताबिक, मुंगेली से लगभग 10 किलोमीटर दूर ग्राम पंचायत कंतेली में 16वीं सदी से यह परंपरा चलती आ रही है. यहां दशहरे के दिन एक परिवार जोकि कंतेली परिवार के नाम से जाना जाता है, उनकी ओर से सवारी निकाली जाती है. यह सवारी कुल देवी मंदिर तक जाती है. यहां पहुंच कर महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली की पूजा-अर्चना का जाती है.
44 गांव के लोग शामिल होते हैं
इस परंपरा में 44 गांव के लोग शामिल होते हैं. जुलूस खूब धूमधाम से निकाला जाता है. जुलूस में नाच-गाना और धार्मिक आयोजन होते हैं. देवी की पूजा के बाद ग्रामीण एक दूसरे से गले लगते हैं और ग्रामीण राजा को सोनपत्ती अर्पित कर आशीर्वाद लेते हैं.इस गांव को छत्तीसगढ़ का पहला ऐसा गांव माना जाता है जहां रावण का दहन नहीं होता. बल्कि पूजा की जाती है.
दशहरे के दूसरे दिन रावण का वध
वहीं, छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले के एक गांव में दशहरे के दूसरे दिन रावण का वध किया जाता है. यही नहीं, जिस तरीके से रावण का वध किया जाता है, वो तरीका भी बिल्कुल अलग है. यहां, रावण के पुतले को नाव से तालाब के बीचों-बीच ले जाया जाता है. और बड़े अलग तरीके से यानी कि, रिमोट से जलाया जाता है.