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नवरात्रि पर विशेष : बिखरते थे ज्योति कलश, सहेजकर खड़ा कर दिया अनूठा मंदिर

Chhattisgarh October 11, 2026 रिपोर्टर: shailesh
नवरात्रि पर विशेष : बिखरते थे ज्योति कलश, सहेजकर खड़ा कर दिया अनूठा मंदिर

नवरात्रि पर विशेष : बिखरते थे ज्योति कलश, सहेजकर खड़ा कर दिया अनूठा मंदिर

धमधा : नौ दिनो तक जिन ज्योति कलशों में श्रद्धालु माता की आराधना करते है. नवरात्रि के बाद बिखर जाने वाले उन्हीं कलशों को सहेजने के संकल्प ने छत्तीसगढ़ के धमधा में एक अनूठे मंदिर को जन्म दिया। वर्ष 2010 में नरेंद्र बाबा की पहल से स्थापित इस मंदिर की पहचान इसकी विशिष्ट कलश संरचना, देवी-देवताओं की प्रतिमाओं और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था से है।

मंदिर निर्माण के पीछे स्वप्न में मिली प्रेरणा और वर्षों के समर्पण की कहानी भी जुड़ी है। नवरात्रि के पहले दिन आइए जानते है, कैसे एक विचार ने श्रद्धा के प्रतीकों को आस्था के एक बड़े केंद्र में बदल दिया। नवरात्रि के बाद इधर-उधर बिखरे पड़े ज्योति कलशों को सहेजने के विचार से शुरू हुई यह यात्रा वर्ष 2010 में मंदिर की स्थापना तक पहुंची। आज यह मंदिर अपनी विशिष्ट कलश संरचना, विभिन्न देवी- देवताओं की प्रतिमाओं और नवरात्रि के दौरान होने वाले धार्मिक आयोजनों के लिए श्रद्धालुओं के बीच विशेष पहचान रखता है।

नवरात्रि के बाद बिखरे ज्योति कलशों को सहेजने की अनोखी पहल

मंदिर के संस्थापक नरेंद्र बाबा बताते है कि, कलश मंदिर की स्थापना की कहानी धार्मिक सेवा से जुड़ी है। वे नगर और आसपास के विभिन्न मंदिरों में नवरात्रि के अवसर पर सेवा कार्य किया करते थे। इस दौरान उन्होंने देखा कि नवरात्रि संपन्न होने और ज्योति कलशों के विसर्जन के बाद कई कलरा इधर-उधर बिखरे पड़े रहते है। जिन कलशों में नौ दिनों तक श्रद्धालु माता की आराधना करते है, ज्योति प्रज्वलित करते हैं और अपनी मनोकामनाएँ अर्पित करते है.

उन्हें इस तरह बिखरा देखकर उनके मन में उन्हें एक स्थान पर सहेजने का विचार आया। इसी विचार ने आगे चलकर मंदिर निर्माण का रूप लिया। नरेद्र बाबा ने विभिन्न मंदिरों में जाकर उनके संस्थापको और सेवकों से संपर्क किया तथा नवरात्रि के बाद उपलब्ध होने वाले ज्योति कलशों को एकत्रित करना शुरू किया। धीरे-धीरे कलशों का संग्रह बढ़ता गया और उन्हें एक विशिष्ट धार्मिक संरचना के रूप में विकसित करने की योजना तैयार हुई।

वर्ष 2010 में रखी गई कलश मंदिर की नीव

नरेंद्र बाबा के संकल्प और निरंतर प्रयासों से वर्ष 2010 में कलश मंदिर की स्थापना की गई। एकत्रित कलशों को एक-दूसरे के ऊपर व्यवस्थित कर मंदिर को विशिष्ट स्वरूप देने का प्रयास किया गया। इस प्रकार नवरात्रि की धार्मिक परंपरा से जुड़े कलशों को एक नई पहचान मिली। मंदिर की स्थापना के पीछे उद्देश्य केवल एक धार्मिक संरचना तैयार करना नहीं था, बल्कि श्रद्धा के प्रतीकों को सहेजना और उन्हें स्थायी रूप देना भी था। शुरुआत में इस पहल को व्यापक सहयोग नहीं मिला. फिर भी नरेद्र बाबा अपने साथियों के साथ मंदिर की सेवा और विकास में जुटे रहे। एक-एक कलश को जोड़कर मंदिर का स्वरूप विकसित करने की यह पहल इस बात का उदाहरण है कि दृढ़ संकल्प और निरंतर प्रयास से सीमित संसाधनों में भी एक विशिष्ट धार्मिक स्थल का निर्माण किया जा सकता है।

स्वप्न में मिले संकेत और मूर्ति स्थापना की मान्यता

कलश मंदिर से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं में देवी-देवताओं की प्रतिमाओं की स्थापना का प्रसंग भी महत्वपूर्ण है। मंदिर से जुड़े विवरण के अनुसार, संस्थापक नरेंद्र बाबा को स्वप्न में एक मूर्ति के संबंध में संकेत प्राप्त हुआ। बताया जाता है कि बेमेतरा जिले के रानो जानो गाँव में जमीन के भीतर एक मूर्ति मिली थी, जिसे ग्रामीणों की सहमति से मंदिर में स्थापित किया गया। इसके बाद धार्मिक आस्था और स्वप्नों से जुड़ी मान्यताओं के आधार पर मंदिर में अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं की स्थापना का क्रम आगे बढ़ा। आज मंदिर में भगवान जगन्नाथ, भगवान गणेश, शनिदेव, संतोषी माता दुर्गा माता, सरस्वती माता, ऋषि भगवान, भगवान कृष्ण, माँ काली और भगवान हनुमान जी सहित विभिन्न देवी-देवताओ की प्रतिमाएँ स्थापित है। इनमे भगवान हनुमान जी मंदिर के प्रमुख आराध्य के रूप में विशेष महत्व रखते है।

नवरात्रि में उमड़ती है श्रद्धालुओं की आस्था

नवरात्रि के अवसर पर कलश मंदिर में विशेष धार्मिक वातावरण रहता है। इस दौरान ज्योति कलश प्रज्वलित किए जाते है, पूजा-अर्चना होती है और श्रद्धालु देवी-देवताओं के दर्शन के लिए पहुंचते है। मंदिर से जुड़ी जानकारी के अनुसार, नवरात्रि के समय दूर-दराज के क्षेत्रों और अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु यहाँ दर्शन करने आते है। इस अवसर पर भंडारे का आयोजन भी किया जाता है, जिसमे श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया जाता है। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ सेवा और सहयोग की भावना इस आयोजन को विशेष बनाती है। मंदिर में प्रज्वलित ज्योतियों श्रद्धालुओं के लिए आस्था, आशा और मनोकामना का प्रतीक है। कलश मंदिर का विकास निरंतर प्रयासों और धार्मिक समर्पण से जुड़ा रहा है। नरेद्र बाबा और उनके साथियों ने शुरुआती चुनौतियों के बावजूद मंदिर की सेवा जारी रखी। समय के साथ मंदिर का स्वरूप विकसित हुआ और श्रद्धालुओं का जुड़ाव बढ़ा।

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