ऐसे हुआ था मां नर्मदा का जन्म, यहां पढ़िए पौराणिक कथा

ऐसी कई नदियां हैं, जिन्हें भारतीय संस्कृति में पवित्र और पूजनीय माना जाता है। इन नदियों को मां कहा जाता है। सात पवित्र नदियों में से एक नर्मदा नदी भी है। माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि 15 फरवरी को सुबह 10 बजकर 12 मिनट पर शुरू होगी। यह 16 फरवरी को सुबह 08:54 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के अनुसार, 16 फरवरी को नर्मदा जयंती मनाई जाएगी। नर्मदा नदी के अवतरण की कई कहानियां प्रचलित हैं। ऐसे में नर्मदा जयंती के मौके पर आइए, जानते हैं कि नर्मदा जी का अवतरण कैसे हुआ था।

नर्मदा जयंती कथा

नर्मदा नदी के पृथ्वी पर अवतरण की कथा स्कन्द पुराण में मिलती है। कथा के अनुसार, राजा हिरण्य तेजा ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए चौदह हजार वर्षों तक कठोर तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न किया। तब उन्होंने महादेव से नर्मदा जी को पृथ्वी पर लाने का वरदान मांगा। भगवान शिव की आज्ञा से नर्मदा जी मगरमच्छ पर बैठकर उदयाचल पर्वत पर उतरीं और पश्चिम की ओर बहने लगीं।

मां नर्मदा की ये कथाएं भी हैं प्रचलित

एक अन्य कथा के अनुसार, एक बार जब भगवान शिव तपस्या में थे, तो उनके पसीने से एक कन्या प्रकट हुई। इस कन्या में अलौकिक सौंदर्य था। तब भगवान शिव और माता पार्वती ने उनका नामकरण करते हुए कहा कि तुमने हमारे मन को प्रसन्न कर दिया है, इसलिए आज से तुम्हारा नाम नर्मदा होगा। नर्मदा का शाब्दिक अर्थ है “सुख देने वाली।”

वहीं, एक अन्य कथा के अनुसार, देवताओं और राक्षसों के बीच कई बार युद्ध हुए, इसलिए देवता भी पाप के भागीदार बन गए। इस समस्या को लेकर सभी देवता भगवान शिव के पास गए और उनसे इसका समाधान पूछने लगे। इस पर भगवान शिव ने देवताओं के पाप धोने के लिए मां नर्मदा की उत्पत्ति की।

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