डॉक्टरो पर राहत के छींटे : आयुष्मान इंटेसिव की लंबित राशि का 10 फीसदी भुगतान

रायपुर। आयुष्मान योजना के तहत मरीजों का इलाज करने वाले सरकारी अस्पतालों के डाक्टरों पर प्रोत्साहन राशि के नाम पर राहत के छींटे पड़े हैं। पिछले दो साल में उनका इंटेंसिव लाखों रुपये हो चुका है, जिसकी 10 फीसदी राशि उन्हें भुगतान की जा रही है। डाक्टरों के साथ अन्य चिकित्सकीय स्टाफ मिलाकर करीब 30 हजार लोगों को करीब 40 करोड़ रुपये का भुगतान किया जाना है अभी सरकारी के साथ निजी अस्पतालों को आयुष्मान योजना के तहत मरीजों के इलाज के बदले राशि का भुगतान नहीं किए जाने का मामला गरमाया हुआ है।

निजी अस्पताल भुगतान नहीं होने पर सितंबर से इलाज नहीं करने का मूड बना रहे हैं और शासन द्वारा उनकी नाराजगी दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। इसी बीच वर्ष 2023 से सरकारी अस्पतालों के डाक्टर सहित अन्य चिकित्सकीय स्टॉफ की लंबित प्रोत्साहन राशि का कुछ हिस्सा भुगतान किए जाने की प्रक्रिया शुरू की गई है। कुछ डाक्टरों के खाते में पेंडिंग राशि जो बढ़कर सात से दस लाख रुपये तक हो चुकी है, उन्हें सात से दस फीसदी राशि दी गई है। अधिकारिक सूत्रों का कहना है कि, अन्य स्टाफ की नाराजगी दूर करने और सरकारी अस्पतालों में उपचार व्यवस्था को सही बनाए रखने के लिए अन्य स्टाफ के खाते में भी राशि का भुगतान किए जाने की संभावना है। वर्तमान में चिकित्सा शिक्षा विभाग के साथ स्वास्थ्य संचालनालय के अंतर्गत काम करने वाले चिकित्सकीय स्टाफ का करीब 40 करोड़ रुपये बकाया है।

टीम भावना जागृत करने बनाया नियम

सूत्रों के अनुसार आयुष्मान स्वास्थ्य योजना के तहत मरीजों को निशुल्क उपचार के लिए प्रोत्साहित करने और उनमें टीम भावना जागृत करने के लिए पांच साल पहले प्रोत्साहन राशि दिये जाने का नियम बनाया गया था। इसके तहत अस्पतालों को स्वास्थ्य योजना से इलाज के बाद प्राप्त होने वाली वलेम राशि का 25 फीसदी हिस्सा प्रोत्साहन राशि के रूप में चिकित्सकीय स्टाफ को वितरित किये जाने का प्रावधान किया गया है। दो साल तक इंटेंसिव का भुगतान नियमित रूप से किया जाता रहा, फिर अनियमितता की शिकायत के बाद इस पर रोक लगा दी गई।

सीनियर डाक्टरों के लाखों रुपए

सूत्रों के अनुसार आयुष्मान प्रोत्साहन राशि के रूप में विभिन्न मेडिकल कालेजों के क्लीनिकल विभागों में काम करने वाले सीनियर डाक्टर और सर्जनों को लाखों रुपये तक प्राप्त होते थे। रायपुर के शासकीय मेडिकल कालेज में कुछ चिकित्सक ऐसे थे, जिनकी प्रोत्साहन राशि उनके वेतन से अधिक हो जाती थी। वहीं जिला स्तर पर भी चिकित्सकीय स्टाफ के बीच ही इसका वितरण होता रहा। निचले स्तर के कर्मचारियों को उनका हिस्सा नहीं मिला और नाराजगी फैलने पर यह व्यवस्था बाधित हो गई थी।

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