Chanakya Niti: जीवन में उतार लें आचार्य चाणक्य के ये 6 श्लोक, सफलता की राह हो जाएगी आसान

आचार्य चाणक्य ऐसे युगदृष्टा थे, जिनकी दी हुई सीख आज भी लोगों का मार्गदर्शन कर रही है। आचार्य चाणक्य ने राजनीति व अर्थशास्त्र के अलावा सामाजिक व पारिवारिक जीवन पर भी कई बातें कही है, जो आज भी लोगों के लिए पथ प्रदर्शक साबित होती है। आचार्य चाणक्य ने वैवाहिक जीवन, जीवन में सफलता, नौकरी, दोस्ती आदि को लेकर गहराई से विचार किया था। यहां जाने आचार्य चाणक्य के 6 ऐसे श्लोकों के बारे में, जिन्हें यदि आपने अपने पूरी तरह से अपने जीवन में उतार लिया तो सफलता की राह आसान हो जाएगी। साथ ही सफलता का स्वाद भी लंबे समय तक ले सकते हैं और शिखर पर स्थापित हो सकते हैं।
ते पुत्रा ये पितुर्भक्ताः सः पिता यस्तु पोषकः। तन्मित्रं यत्र विश्वासः सा भार्या या निवृतिः॥
आचार्य चाणक्य इस श्लोक में कहते हैं कि संतान वही है जो अपने पिता की सेवा करे। पिता उसे ही कह सकते हैं, जो पूरे परिवार का लालन-पालन कर सके। वहीं मित्र उसे ही कहा जा सकता है, जिस पर पूर्ण विश्वास किया जा सके। साथ ही पत्नी उसे ही कहा जा सकता है, जो हमेशा खुश रखें और सभी जिम्मेदारियों को भली-भांति पूरा कर लें।
प्रभूतंकार्यमल्पंवातन्नरः कर्तुमिच्छति। सर्वारंभेणतत्कार्यं सिंहादेकंप्रचक्षते॥
इस श्लोक में आचार्य चाणक्य ने कहा है कि मनुष्य को अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए डटकर मुकाबला करना चाहिए। हमेशा शेर के तरह अपने लक्ष्य की ओर आक्रामक रहना चाहिए। जिस तरह एक शेर एकाग्रता के साथ शिकार पर नजर रखता है, वैसे ही हर व्यक्ति को अपने लक्ष्य को पाने के लिए हमेशा एकाग्र होना चाहिए।
नात्यन्तं सरलैर्भाव्यं गत्वा पश्य वनस्थलीम्। छिद्यन्ते सरलास्तत्र कुब्जास्तिष्ठन्ति पादपाः॥
इस श्लोक में आचार्य चाणक्य ने कहा है कि मनुष्य को हद से ज्यादा भी सरल और सीधा नहीं होना चाहिए। जंगल के वृक्षों में सबसे पहले सीधे वृक्षों को काटा जाता है उसी प्रकार सीधे मनुष्य को चालाक और चतुर लोग पहले फायदा उठाते हैं।
विषादप्यमृतं ग्राह्यममेध्यादपि काञ्चनम्। नीचादप्युत्तमां विद्यांस्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि।।
चाणक्य के मुताबिक हमेशा अच्छे ज्ञान व अच्छी वस्तु की ओर आकर्षित होना चाहिए। यदि सोना गंदगी में भी गिरा हो तो उसे उठा लेना चाहिए। साथ ही यदि कोई व्यक्ति निचले कुल में भी जन्मा है और आपको ज्ञान दे रहा है तो उससे ज्ञान ले लेना चाहिए क्योंकि ज्ञान ही हर स्थान पर काम में आता है।
अधीत्येदं यथाशास्त्रं नरो जानाति सत्तमः । धर्मोपदेशं विख्यातं कार्याऽकार्य शुभाऽशुभम् ।।
इस श्लोक में आचार्य चाणक्य ने कहा है कि जो व्यक्ति शास्त्रों के नियमों का निरंतर अभ्यास करके शिक्षा प्राप्त करता है उसे सही, गलत और शुभ कार्यों का ज्ञान हो जाता है। इसलिए ऐसे लोग जीवन में अपार सफलता प्राप्त करते हैं.
आपदर्थे धनं रक्षेद्दारान् रक्षेध्दनैरपि । नआत्मानं सततं रक्षेद् दारैरपि धनैरपि ।।
चाणक्य नीति ने इस श्लोक में कहा है कि मनुष्य को आने वाली मुसीबतों से बचने के लिए धन संग्रह करना चाहिए। लेकिन धन-सम्पदा त्यागकर भी हमेशा पत्नी की सुरक्षा करनी चाहिए। वहीं आत्मा की सुरक्षा करना है तो धन और पत्नी दोनों को तुक्ष्य समझना चाहिए।