ऑस्कर्स में गई थी राजेश खन्ना की डेब्यू फिल्म ‘आखिरी खत’, तीन भाषाओं में बना था रीमेक

मुंबई : क्या आप जानते हैं कि राजेश खन्ना की एक फिल्म ऑस्कर्स में भी गई थी? राजेश खन्ना ने ‘आखिरी खत’ से एक्टिंग डेब्यू किया था और पहली ही फिल्म ने ऑस्कर्स में जाकर इतिहास रच दिया था।

ऑस्कर्स में गई थी राजेश खन्ना की डेब्यू फिल्म ‘आखिरी खत’

राजेश खन्ना भारतीय सिनेमा के पहले सुपरस्टार थे, जिन्होंने लगातार 17 हिट फिल्में देकर रिकॉर्ड बनाया था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि उनकी पहली फिल्म ऑस्कर में भेजी गई थी? उनकी यह डेब्यू फिल्म फ्लॉप रही थी। किसी ने भी इसमें राजेश खन्ना को नोटिस नहीं किया था। पर इसे इंडिया की तरफ से ऑस्कर में भेजा गया था। इस फिल्म का नाम है ‘आखिरी खत’।

58 साल पहले किया था डेब्यू, नाम था ‘आखिरी खत’

यह फिल्म 1966 में आई थी। जब राजेश खन्ना ने ‘आखिरी खत’ से एक्टिंग डेब्यू किया था, तो किसी ने भी उन्हें गंभीरता से नहीं लिया। फिल्म का बजट भी काफी कम था। तब किसी ने सोचा भी नहीं था कि एक आम सा दिखने वाला युवा भारतीय सिनेमा का पहला सुपरस्टार बन जाएगा।

ऐसे शूट की गई थी राजेश खन्ना की डेब्यू फिल्म

‘आखिरी खत’ को चेतन आनंद ने डायरेक्ट किया था, जो देव आनंद के भाई थे। फिल्म को 15 महीने के बच्चे के साथ शूट किया गया था। शूट के लिए चेतन आनंद ने बच्चे को एकदम खुला छोड़ दिया और फिर उसकी नैचुरल हरकतों को छोटे से कैमरे से शूट किया था।

इन भाषाओं में बना राजेश खन्ना की पहली फिल्म का रीमेक

राजेश खन्ना की इस फिल्म को 1967 में हुए ऑस्कर्स में बेस्ट फॉरेन लैंग्वेज कैटिगरी में भेजा गया था, लेकिन अफसोस इसे कोई नॉमिनेशन नहीं मिला था। पर तब यह फिल्म और राजेश खन्ना जरूर चर्चा में आ गए थे। बाद में इस फिल्म को तमिल, तेलुगू और तुर्की भाषा में भी रीमेक किया गया।

ये थी ‘आखिरी खत’ की फिल्म

‘आखिरी खत’ के हीरो राजेश खन्ना थे। कहानी गोविंद नाम के एक लड़के की थी, जो शिल्पकार है। वह मूर्तियां बनाने का काम करता है। उसे लज्जो नाम की लड़की से प्यार हो जाता है और दोनों गांव के मंदिर में चुपचाप शादी कर लेते हैं। इसके बाद गोविंद आगे की पढ़ाई के लिए शहर चला जाता है, जिसके बाद लज्जो को पता चलता है कि वह मां बनने वाली है।

कहानी- 500 रुपये में बेच देती है सौतेली मां

लज्जो की सौतेली मां को यह बात पता लगती है तो वह उसे 500 रुपये में बेच देती है। उसे बुरी तरह पीटा जाता है, प्रताड़ित किया जाता है। फिर लज्जो एक दिन बच्चो को जन्म देती है। वह उसका नाम बंटू रखती है। बंटू को लेकर वह मुंबई गोविंद के पास जाती है, और वहां उसके दरवाजे के बाहर एक चिट्ठी छोड़ आती है।

लज्जो की मौत, आगे क्या हुआ?

कहानी आगे बढ़ती है। लज्जो वह बंटू को लेकर इधर-उधर भटकती है और भूखे भी रहना पड़ता है। एक दिन लज्जो मर जाती है और बंटू अकेला रह जाता है। फिर वह बच्चा कहां-कहां भटकता है और क्या करता है, फिल्म उसी को दिखाती है।

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