जापान ने समुद्र में रेडियोएक्टिव पानी छोड़ना शुरू किया, डर गए चीन और साउथ कोरिया

टोकियो : पूर्व घोषणा के मुताबिक जापान ने समुद्र में फुकुशिमा न्यूक्लियर प्लांट का पानी छोड़ना शुरू कर दिया है।  जापान टाइम्स  की रिपोर्ट के मुताबिक पहले दिन करीब 2 लाख लीटर पानी छोड़ा जाएगा। इसके बाद इसे बढ़ाकर 4.60 लाख लीटर कर दिया जाएगा। जापानी समय के मुताबिक दोपहर 1:03 बजे ये प्रोसेस शुरू किया गया।न्यूक्लियर प्लांट को मेंटेन करने वाली कंपनी TEPCO ने बताया कि सबसे पहले सैंपल के तौर पर शुरुआती टैंक से थोड़ा पानी छोड़ा गया। इसके पहले और बाद में सभी कंडीशन्स चेक की गईं। इसमें कोई गड़बड़ी नजर नहीं आई। प्लांट से पानी को रिलीज करने वाला पंप 24 घंटे एक्टिव रहेगा।

UN की एटॉमिक एजेंसी अप्रूवल पर  रेडियोएक्टिव पानी  हुआ रिलीज

समुद्र में रेडियोएक्टिव पानी रिलीज करने के प्लान को UN की एटॉमिक एजेंसी IAEA अप्रूव कर चुकी है। एक हजार स्टेनलेस स्टील टैंक्स में रखे 133 करोड़ लीटर पानी को एक साथ नहीं बल्कि 30 साल तक रिलीज किया जाएगा। रोज 5 लाख लीटर रेडियोएक्टिव पानी समुद्र में मिलाया जाएगा। अलजजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि समुद्र में इसका असर कम हो। फिलहाल जिस इलाके में पानी छोड़ा जाएगा वहां से 3 किलोमीटर तक के इलाके में मछली पकड़ने पर रोक लगा दी गई है।

आखिर आया  कहां से करोड़ों लीटर रेडियोएक्टिव पानी ?

12 साल पहले 2011 में आए भूकंप और सूनामी की वजह से फुकुशिमा न्यूक्लियर प्लांट में भयानक विस्फोट हुआ था। इसके बाद से ही वहां 133 करोड़ लीटर रेडियोएक्टिव पानी जमा है। न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक वहां जमा पानी करीब 500 ओलंपिक साइज स्विमिंग पुल के जितना है। जैसे ही जापान ने इस पानी को समुद्र में मिलाने की बात कही, चीन और दक्षिण कोरिया के लोग डरे हुए हैं। 11 मार्च को  जापान में 9.1 तीव्रता का भूकंप आया और इससे  सुनामी आ गई।

भूकंप के झटके महसूस होते ही फुकुशिमा में समुद्र किनारे बने न्यूक्लियर प्लांट के रिएक्टर बंद कर  रिएक्टर की कूलिंग के लिए जनरेटर स्टार्ट कर दिए गए। इमरजेंसी जनरेटर गर्म रिएक्टर को ठंडा कर पाता, इससे पहले ही पानी प्लांट में घुस आया।इसके बाद इमरजेंसी जेनरेटर बंद हो गया जिससे गर्म रिएक्टर पिघलने लगा। कुछ देर बाद न्यूक्लियर पावर प्लांट में भयानक विस्फोट होने लगे। आने वाले कई महीनों तक न्यूक्लियर रिएक्टर्स में चेन रिएक्शन होने से रोकने के लिए उसे 133 करोड़ लीटर समुद्र के पानी से ठंडा रखा गया।

चीन और  साउथ कोरिया को इस बात का डर

इससे पानी में 64 तरह के रेडियोएक्टिव मटेरियल घुल गए। इनमें कार्बन-14, आयोडिन-131, सीजियम- 137, स्ट्रोनटियम-90 कोबाल्ट , हाइड्रोजन-3 और ट्राइटियम ऐसे एलिमेंट्स हैं, जो इंसानों के लिए हानिकारक हैं। इनमें से ज्यादातर रेडियोएक्टिव मटेरियल्स की लाइफ काफी कम होती है। इससे इनका असर खत्म हो चुका है। हालांकि, कार्बन-14 जैसे कुछ मटेरियल हैं जिसका असर कम होने में 5 हजार साल लगते हैं। इसके अलावा न्यूक्लियर रिएक्टर पानी में अभी भी ट्राइटियम के कण मौजूद हैं। इसकी वजह से चीन और  साउथ कोरिया को डर है कि ये सी फूड यानी मछली, क्रैब और समुद्री जीवों के जरिए इंसानों के शरीर तक पहुंच सकता है। ट्राइटियम के स्किन पर गिरने से नुकसान नहीं होता, लेकिन शरीर में घुसने से कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।

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