पृथ्वी से कितना दूर है चंदा मामा का घर, सदियों से चले आ रहे महारहस्य का पता लगाएगा ‘भांजा’ विक्रम

नई दिल्ली : चांद हमारे आसमान में सबसे चमकदार दिखने वाली चीज है। आज दुनिया चांद पर जा रही है। धरती से जब भी कोई रॉकेट चांद के लिए उड़ान भरता है तो उसे पहुंचने में दिन से महीने भर तक लग जाते हैं। यह अलग अलग स्पेसक्राफ्ट की स्पीड पर निर्भर करता है। भारत का चंद्रयान-3 मिशन लॉन्च होगा और अनुमान के मुताबिक 23 अगस्त को यह चांद पर पहुंच जाएगा जो एक महीने से ज्यादा का समय है। ऐसे में सवाल है कि चांद की दूरी कितनी है, जहां पहुंचने में इतना समय लग जाता है।

चांद और पृथ्वी की दूरी कितनी है

चांद दूर होकर भी हमारी पृथ्वी पर समुद्री ज्वार और सूर्य पर ग्रहण लगाकर उसे प्रभावित कर सकता है। नासा के मुताबिक धरती और चांद के बीच की औसत दूरी लगभग 384,400 किमी है। दरअसल चांद पृथ्वी को केंद्र मान कर चक्कर नहीं लगाता। इसलिए इसके बीच की दूरी समय-समय पर घटती बढ़ती रहती है। कभी यह हमारे ग्रह के करीब होता है तो कभी बेहद दूर होता है। चंद्रयान-3 के विक्रम लैंडर में एक यंत्र है जो इसकी दूरी को और सटीकता से मापेगा।

​सबसे  नजदीक चांद की दूरी

जब चंद्रमा पृथ्वी से अपनी सबसे कम दूरी पर या सबसे करीब होता है तो इसे उपभू (Perigee) के रूप में जाना जाता है। तब यह 363,300 किमी दूर होता है। इस दौरान अगर चांद अपने पूर्णिमा के चरण में हो तो यह सूपरमून कहलाता है। यह शब्द वैज्ञानिक नहीं है, लेकिन खगोलीय घटनाओं पर नजर रखने वाले इस्तेमाल करते हैं।

​पृथ्वी से सबसे दूरी पर चांद

जब चंद्रमा पृथ्वी से सबसे दूरी पर होता है तो इसे अपभू कहा जाता है। यह हमारे ग्रह से 405,500 किमी दूर होता है। इस दौरान अगर सूर्य ग्रहण होता है तो आसमान में आग की एक रिंग जैसा दिखता है। इस दूरी और करीबी को देखते हुए भी मिशन लॉन्च किया जाता है। इंसानों को भेजने वाला मिशन किसी सैटेलाइट भेजने से तेज होता है। नासा ने आज तक चांद से जुड़े आठ चालक दल वाले मिशन चंद्रमा पर भेजे हैं।

​इंसानों को पहुंचने में कितना समय लगा

अपोलो-11 पहली बार इंसानों को लेकर चांद पर पहुंचा था। तब इसे चांद की सतह तक पहुंचने में 4 दिन छह घंटे और 45 मिनट लगे थे। हालांकि एक ऐसा स्पेसक्राफ्ट भी रहा है, जिसे चांद तक पहुंचने में आधा दिन भी नहीं लगा है। ये स्पेसक्राफट था न्यू होराइजन्स जिसे चांद तक पहुंचने में सिर्फ 8 घंटे 35 मिनट लगे थे। तब अंतरिक्ष यान न तो धीमा हुई और न ही चंद्रमा की कक्षा के करीब पहुंचा बल्कि प्लूटो की यात्रा पर चलता रहा।

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