ऐसे समय में होती है नौकर, मित्र और पत्नी की पहचान, जानें क्या कहते हैं आचार्य चाणक्य

आचार्य चाणक्य की शिक्षाओं को आज सैकड़ों साल बाद भी दुनिया के अधिकांश लोग पथ प्रदर्शक मानते हैं। आचार्य चाणक्य ने जीवन के कई क्षेत्रों के बारे में कई गूढ़ बातें बताई हैं और उनके द्वारा बताए गए नीति सिद्धांतों का जीवन में पालन करने पर सफलता पाई जा सकती है। ऐसे में आचार्य चाणक्य ने बताया कि जीवन पथ पर कुछ लोगों की पहचान समय आने पर ही हो सकती है। आचार्य चाणक्य के इस श्लोक को यहां समझें –
जानीयात् प्रेषणे भृत्यान् बान्धवान्व्यसनाऽऽगमे।
मित्रं चापत्तिकालेषु भार्यां च विभवक्षये ।।
आचार्य चाणक्य ने इस श्लोक में कहा है कि काम लेने पर नौकर-चाकरों की, दुख आने पर बंधु-बांधवों की, कष्ट आने पर मित्र की और धन नाश होने पर अपनी पत्नी की वास्तविकता का ज्ञान होता है।
आचार्य चाणक्य ने कहा है कि जब सेवक (नौकर) को किसी कार्य पर नियुक्त किया जाएगा, तभी पता चलेगा कि वह कितना योग्य है। इसी प्रकार जिस समय व्यक्ति किसी मुसीबत में फंस जाता है तो उसी समय दोस्तों व और रिश्तेदारों की परीक्षा होती है। मित्र की पहचान भी विपत्ति के समय ही होती है। इसी प्रकार धनहीन होने पर पत्नी की वास्तविकता का पता चलता है कि उसका प्रेम धन के कारण था या वास्तविक।
आतुरे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रु- संकटे।
राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः ।।
आचार्य चाणक्य ने कहा है कि सच्चे मित्र व दोस्त के बारे में बताया है कि किसी रोग से पीड़ित होने पर, दुख आने पर, अकाल पड़ने पर, शत्रु की ओर से संकट आने पर, श्मशान अथवा किसी की मृत्यु के समय जो व्यक्ति साथ नहीं छोड़ता, वास्तव में वही सच्चा मित्र व रिश्तेदार होता है।
आचार्य चाणक्य के मुताबिक जब कोई व्यक्ति रोग शय्या पर हो, अकाल पड़ने और शत्रु द्वारा किसी भी प्रकार का संकट पैदा होने, किसी मुकदमे आदि में फंस जाने और मरने पर जो व्यक्ति श्मशान घाट तक साथ देता है, वही सच्चा बन्धु (अपना) होता है अर्थात ये अवसर ऐसे होते हैं जब सहायकों की आवश्यकता होती है।