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सिटोंगा का अनोखा नाग दरबार, जहां पूजा में नागों की तरह हरकतें करने लगते हैं श्रद्धालु!

Chhattisgarh August 17, 2026 रिपोर्टर: shailesh
सिटोंगा का अनोखा नाग दरबार, जहां पूजा में नागों की तरह हरकतें करने लगते हैं श्रद्धालु!

सिटोंगा का अनोखा नाग दरबार, जहां पूजा में नागों की तरह हरकतें करने लगते हैं श्रद्धालु!

जशपुर : जिले के पास स्थित सिटोंगा गांव का नाग दरबार नागपंचमी पर लगने वाला एक अनोखा और पारंपरिक आयोजन है. यहां खेतों के बीच स्थित नागदेवता के छोटे से मंदिर में बांकी और श्री नदियों को नाग व नागिन के रूप में पूजा जाता है.

मान्यता है कि इस दरबार में नाग देवता भक्तों पर सवार होते हैं. प्रकृति से जुड़ी इस अनोखी पूजा में शामिल होने के लिए जिलेभर से श्रद्धालु पहुंचते हैं. खेतों के बीच स्थित छोटे से नागदेवता मंदिर को लेकर स्थानीय लोगों में गहरी आस्था है.

सिटोंगा का नाग दरबार की अनोखी कहानी

मंदिर के पुजारी लहरू बाबा के अनुसार, यहां स्थापित मूर्ति बांकी और श्री नामक भाई-बहन की है. मान्यता है कि दोनों सिटोंगा के ही रहने वाले थे और बेहद गरीब परिवार से थे. दोनों अपनी सौतेली मां से परेशान रहते थे.

लोककथा के अनुसार, एक दिन उनकी मां ने भूखे-प्यासे बांकी और श्री को खेत की रखवाली के लिए भेज दिया. भूख से बेहाल दोनों ने खेत में मौजूद सांप के दो अंडों को पकाकर खा लिया. इसके बाद उनके शरीर के सर्प की आकृति में बदल जाने की मान्यता है.

कहा जाता है कि सर्प रूप धारण करने के बाद दोनों खेत में बने एक कुंड में जाकर छिप गए. काफी देर तक घर नहीं लौटने पर मां और पिता उन्हें तलाशते हुए खेत पहुंचे. माता-पिता को अपनी ओर आते देखकर बांकी पश्चिम दिशा में और श्री पूर्व दिशा की ओर भागी.

स्थानीय जनश्रुतियों के मुताबिक, सर्प रूप में दोनों के कुंड से अलग-अलग दिशाओं में भागने से बांकी और श्री नदी का उद्गम हुआ. इसी मान्यता के कारण दोनों नदियों को भाई-बहन के रूप में भी देखा जाता है.

नागों की तरह हरकतें करने लगते हैं श्रद्धालु

वहीं सिटोंगा के नाग दरबार में नागदेव के श्रद्धालुओं पर सवार होने की मान्यता भी प्रचलित है. मंदिर में नागदेवता की पूजा शुरू होने के बाद कुछ श्रद्धालुओं के माध्यम से नागदेव के दर्शन होने की मान्यता है.

मान्यता के अनुसार, शरीर पर नागदेव के आने के बाद श्रद्धालु अलग तरह की हरकतें करने लगते हैं. इसके बाद नदी के पास स्थित कुंड में उन्हें स्नान कराया जाता है. दूध पिलाने के बाद उनके शांत होने की मान्यता है.

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