पहले खरीदारी फिर लक्ष्मी पूजा कर आत्मसमर्पित नक्सलियों ने पहली बार मनाई दीवाली, जमकर की आतिशबाजी

नारायणपुर : देशभर में 20 अक्टूबर दीपावली का पर्व धूमधाम से मनाया गया, इस बीच नारायणपुर में आत्म समर्पण करने वाले नक्सलियों ने भी सालों बाद दीवाली का पर्व धूमधाम से मनाया. आत्मसमर्पित नक्सलियों ने पहले मां लक्ष्मी की पूजा अर्चना की, उसके बाद जमकर आतिशबाजी कर दीपावली का पर्व मनाया. इस दौरान सभी के चेहरे पर खुशी देखते बन रही थी.

सरेंडर नक्सलियों ने पहले की खरीदारी फिर की लक्ष्मी पूजा

नारायणपुर के तंग गलियों और पटाखे की बाजार में आज कुछ अलग ही हलचल दिखी. ऐसे लोग जो कभी जंगल से निकलकर जान-माल को भय में रख देते थे, वो शांतचित्त होकर दिवाली के पटाखे खरीदते दिखे. पूर्व माओवादी संगठनों से अलग होकर नागरिक जीवन अपनाने वाले कई पुरुष और महिलाएं पहली बार खुले मन से दिवाली मना रहे हैं. उन्होंने बताया कि वर्षों तक वही पटाखे कभी हिंसा के साधन बने, लेकिन आज उन्होंने स्पष्ट रूप से हिंसा का परित्याग कर दिया है और चाहता हैं कि उनका परिवार, गांव और गांववालों के साथ सामुदायिक उत्सव का हिस्सा बनें.

पहली बार मनाई दिवाली

जिस पटाखे से कभी जवानों को निशाना बनाया जाता था, वही पटाका आज मेरे बच्चों की हंसी के साथ फूटेगा,” कहकर 40 के आसपास के एक पूर्व लड़ाके ने आंखें नम हो कर बताया. “हमने अपनी गलती स्वीकारी है, और अब हमारी इच्छा है कि हमारी अगली पीढ़ी डर की नहीं, खुशियों की दिवाली देखे. बाजार के दुकानदारों ने भी बदलाव का स्वागत किया. एक पटाखा विक्रेता ने कहा, “पहले हमें नहीं पता था कि इनके हाथ में क्या था और किस मकसद से आते थे. आज जब इन्हें देखकर पता चला कि वे बदल गए हैं, तो दिल से खुशी हुई. इन्हें भी सबको वैसा ही सम्मान मिलना चाहिए जैसा किसी भी नागरिक को मिलता है.”

स्थानीय प्रशासन और समाजसेवी समूहों ने भी पुनर्वास और पुनःसम्मिलन की प्रक्रिया में इन लोगों का साथ दिया है. रोजगार, कौशल प्रशिक्षण और सामुदायिक मेल-जोल के अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं. विकास कार्यों और शांति वार्ताओं की बदौलत कई परिवारों को भविष्य की नई उम्मीद दिख रही है।एक सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा, “सज़ा और कानून का अपना स्थान है, पर साथ ही अगर लोग सच्चे मन से हिंसा छोड़ना चाहते हैं तो समाज को उन्हें मौका देना चाहिए. आज की यह दिवाली सिर्फ पटाखों की रोशनी नहीं है. यह मानवीयता और भरोसे की भी रोशनी है.”
नारायणपुर की इस दिवाली की सबसे बड़ी तस्वीर शायद यही है: पुराने भय और संघर्ष को पीछे छोड़, अब वहीं लोग अपने बच्चों के साथ मिठाइयां बांट रहे हैं, दीये जला रहे हैं और पटाखों की हल्की-सी गूँज में अपनी नई शुरुआत का जश्न मना रहे हैं.

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